पिछले कुछ दिनों से मेरा कवि (read as कौवा ) मन कविता लिखने के लिए बेकरार था और इश्किया फिल्म का गाना दिल तो बच्चा है जी सुनके मेरा कवि मन जाग उठा और आपके सामने ये कविता प्रस्तुत है … किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा करें
*** इस गाने के सभी पात्र काल्पनिक है ***
**इस गाने को copy करते समय credits अवश्य दें**

ऐसी लागी भूख जो मिटती ही नहीं
दांत से बासी रोटी कटती नहीं
उम्र कब की बरस के सुफैद हो गई
कारी दाल चने की पचती नहीं
वल्ला ये गैस बढ़ने लगी है
चेहरे की रंगत उड़ने लगी है
डर लगता है ऑफिस में सोने में जी
दाल तो अच्छा है जी – २
थोडा कच्चा है जी
दाल तो अच्छा है जी – २
ऐसी लागी भूख जो मिटती ही नहीं
दांत से बासी रोटी कटती नहीं
उम्र कब की बरस के सुफैद हो गई
कारी दाल चने की पचती नहीं
रा रा रा …

किसको पता था बाजू में बैठा
colleague ऐसा पाजी भी होगा
हम तो हमेशा समझते थे कोई
हम जैसा फर्जी ही होगा
हाय जोर करें, कितना शोर करें,
मेरी स्क्रीन पे ऐंवे गौर करें
boss सा कोई कमीना नहीं
कभी तो रोके, कभी तो टोके,
इस उम्र में खिलायेगा धक्के
डर लगता है facebook chat करने में जी
दिल तो बच्चा है जी – २
थोडा कच्चा है जी
हाँ दिल तो बच्चा है जी

ऐसी उदासी बैठी है दिल पे
हंसने से घबरा रहे है
सारा साल कामचोरी में काटा
appraisal में टकरा गए है
mail आता है तो ऐसे लगता है वो
आ रहा है यहीं देखता ही न वो
recession की मारें कटार रे
तौबा ये लम्हें कटते नहीं क्यूँ
आँखें मेरी खुलती ही नहीं क्यूँ
डर लगता है timepass करने में जी
दिल तो बच्चा है जी – २
थोडा कच्चा है जी
हाँ दिल तो बच्चा है जी

– कवि देव